Smriti diwas program

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प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, पिलानी सेवा केंद्र पर संस्थान के संस्थापक पिताश्री प्रजापिता ब्रह्मा बाबा का 57वाँ पुण्य स्मृति दिवस श्रद्धा, शांति एवं भावपूर्ण वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर सीरी से प्रिंसिपल साइंटिस्ट भ्राता डॉ. राजेंद्र कुमार वर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे और उन्होंने ब्रह्मा बाबा को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।

अपने उद्बोधन में डॉ. वर्मा ने कहा कि ईश्वर का अनुभव केवल प्रभु-प्रेम, श्रद्धा एवं शुद्ध भावनाओं के माध्यम से ही संभव है। जब मन निर्मल होता है, तभी आत्मा परमात्मा से जुड़ पाती है।

कार्यक्रम में सेवा केंद्र प्रभारी बी.के. स्वाति दीदी जी एवं बी.के.डॉ.वीणा दीदी जी ने ब्रह्मा बाबा के जीवन, व्यक्तित्व एवं उनके दिव्य कर्तृत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

बी.के. स्वाति दीदी जी ने बताया कि ब्रह्मा बाबा का लौकिक नाम लेखराज कृपलानी था। उनका जन्म 15 दिसंबर 1884 को सिंध हैदराबाद में हुआ। अपनी बौद्धिक प्रतिभा, व्यापारिक कुशलता, व्यवहारिक शिष्टता, अथक परिश्रम, श्रेष्ठ स्वभाव एवं हीरे-जवाहरात की अचूक परख के कारण वे एक सफल एवं प्रतिष्ठित जौहरी बने। उनका प्रमुख व्यापारिक केंद्र कोलकाता था तथा उस समय के राजपरिवारों से भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। इसके बावजूद उनका मन सदैव भक्ति, साधना एवं आध्यात्म की ओर उन्मुख रहता था।

बी.के.डॉ. वीणा दीदी जी ने आगे बताया कि 1935 में ब्रह्मा बाबा को निराकार परमपिता शिव परमात्मा के माध्यम से नई सृष्टि की स्थापना एवं पुरानी सृष्टि के विनाश के साक्षात्कार हुए। उन्हें विष्णु चतुर्भुज स्वरूप एवं आत्मा के वास्तविक स्वरूप का भी दिव्य अनुभव हुआ।
इसके पश्चात 1936 में एक अवसर पर जब वे अपने गुरु जी का सत्संग सुन रहे थे, तभी अचानक वे अपने कक्ष में गए, जहाँ पहली बार निराकार परमपिता परमात्मा शिव ने उनके तन में प्रवेश कर अपना सत्य परिचय दिया—

*“निजानंद स्वरूपं, शिवोऽहम् शिवोऽहम्।*
*ज्ञानस्वरूपं, प्रकाशस्वरूपं, शिवोऽहम् शिवोऽहम्।”*

इस दिव्य अनुभव के पश्चात उन्होंने अपना संपूर्ण व्यापार समेटकर स्वयं को पूर्णतः ईश्वरीय कार्य के लिए समर्पित कर दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि उनके माध्यम से एक महान दिव्य शक्ति कार्य कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप उनके प्रवचनों से अनेक लोगों को गहन आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होने लगीं।

1937 में परमपिता शिव परमात्मा ने नई दुनिया की स्थापना हेतु लेखराज कृपलानी को “ *ब्रह्मा” नाम प्रदान किया और यहीं से उनकी अलौकिक रूहानी यात्रा का शुभारंभ हुआ। ज्ञान का कलश नारी शक्ति पर स्थापित हुआ तथा ब्रह्मा बाबा ने अपनी अर्जित संपूर्ण संपत्ति माताओं-बहनों के ट्रस्ट के रूप में उनके नाम कर दी। तभी से सभी अलौकिक पुत्रियाँ ब्रह्माकुमारी कहलाने लगीं।

उन्होंने बताया कि ब्रह्मा बाबा ने स्व-परिवर्तन द्वारा विश्व-परिवर्तन के महान लक्ष्य के साथ 14 वर्षों तक राजयोग एवं कठोर तपस्या द्वारा सभी को आध्यात्मिक रूप से सशक्त किया। भारत विभाजन के पश्चात 5 मई 1950 को ट्रस्ट को माउंट आबू (राजस्थान) स्थानांतरित किया गया, जिसका नाम प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय रखा गया। परमात्मा की प्रेरणा से प्रशिक्षित सेवाधारी देश के कोने-कोने में तथा आगे चलकर विदेशों तक शांति एवं आध्यात्मिक चेतना का संदेश देने के लिए भेजे गए।

18 जनवरी 1969 को ब्रह्मा बाबा ने देह का परित्याग कर संपूर्णता को प्राप्त किया। आज ब्रह्माकुमारी संस्था 140 से अधिक देशों में शांति , मूल्य एवं आध्यात्मिक जागृति का संदेश प्रसारित कर रही है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व समुदाय शांति स्थापना का दूत मानता है।

पुण्य स्मृति दिवस के अवसर पर सेवा केंद्र प्रभारी बी.के. स्वाति दीदी जी सहित  सभी भाई-बहनों ने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। इस अवसर पर राजयोग मेडिटेशन भी कराया गया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने ब्रह्मा भोजन स्वीकार कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।